Chapter Three - Day One at Hospital

 

12 मार्च की शाम तक सब कुछ तय हो चुका था —
अब हम कल ही लखनऊ जाएंगे।
मैंने उसी शाम हॉस्पिटल में रजिस्ट्रेशन भी करवा लिया था।

घर में सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन माहौल में एक अजीब सी खामोशी थी।
सबने चुपचाप खाना खाया और सोने चले गए।
नींद आँखों से कोसों दूर थी — मन में बस यही सोच चलता रहा कि कल क्या होगा…?


13 मार्च की सुबह,
हम जल्दी उठे और तैयार होकर ट्रेन से डालीगंज, लखनऊ के लिए निकल पड़े।
रास्ते भर पिता जी खिड़की के बाहर देखते रहे — और मैं बस उन्हें।
कभी लगता सब ठीक हो जाएगा, कभी दिल डर से भर जाता।

डालीगंज पहुँचकर हमने एक टैक्सी ली और किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज पहुँच गए।
मुझे पता था कि पहले पर्चा बनवाना होगा, इसलिए मैं जल्दी से उस काउंटर तक गया जहाँ सभी मरीजों के पर्चे बनते थे।
क्योंकि रजिस्ट्रेशन पहले से कर रखा था, मैंने मोबाइल में आया मैसेज दिखाया।
काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने ₹50 लिए और मुझे पर्चा दे दिया।

हम दोनों डेंटल ओपीडी में जाकर नंबर लेकर बैठ गए।
थोड़ी देर इंतज़ार के बाद पिता जी का नंबर आया और वो अंदर गए।

काफ़ी देर तक वो बाहर नहीं निकले।
मुझे लगा शायद डॉक्टर कुछ ज़्यादा पूछताछ कर रहे हैं।
फिर जब पिता जी बाहर आए, तो उनके चेहरे पर एक हल्की थकान थी।
उन्होंने बताया कि डॉक्टर ने कई सवाल किए और कुछ जाँचें लिखी हैं — जिनमें बायोप्सी भी शामिल थी।
(बायोप्सी यानी वह जांच जिससे कैंसर की पुष्टि की जाती है।)

डॉक्टर ने कहा,
“घबराने की बात नहीं है, जांच करवा लेते हैं, तब तक दवा लेते रहिए।”

मैं पिता जी को बाहर बेंच पर बैठाकर दवा लेने चला गया।
जब तक मैं लौटा, तब तक एक दूसरे डॉक्टर ने पिता जी को बुलाया था।
उन्होंने पिता जी से कहा —
“यह कैंसर ही है। बाकी जांच के बाद इलाज शुरू कर देंगे। फिलहाल यह दवा लीजिए और कुछ सामान ले आइए।”

पिता जी ने मुझे फोन पर सब बताया।
मैंने वैसा ही किया जैसा डॉक्टर ने कहा — दवा ली, सामान खरीदा, और फिर बायोप्सी के लिए सैंपल दिया गया।
डॉक्टर ने कहा,
“इसे पैथोलॉजी में जमा कर दो, और एक हफ़्ते बाद रिपोर्ट लेकर आना। तब तक बाकी जांचें पूरी कर लो, ताकि इलाज शुरू किया जा सके।”

सारा काम करते-करते शाम के 5 बज गए थे।
हम दोनों थके हुए, लेकिन भीतर से थोड़ा स्थिर महसूस कर रहे थे — अब कम से कम स्थिति साफ़ थी।

6:15 की ट्रेन से वापस घर लौटने का फैसला किया।
हॉस्पिटल से निकलकर स्टेशन पहुँचे, टिकट लिया और ट्रेन में बैठ गए।
ट्रेन की खिड़की से लखनऊ की रौशनी दूर होती जा रही थी —
और मेरे मन में बस यही प्रार्थना थी —
“ईश्वर, बस मेरे पिता जी ठीक हो जाएं…”

घर पहुँचे तो माँ ने खाना तैयार रखा था।
उन्होंने कुछ पूछा नहीं — बस हमारे चेहरों से सब समझ गईं।
हमने चुपचाप खाना खाया और सो गए।

अगले दिन सुबह मैं फिर स्कूल चला गया।
शाम को लौटा तो पता चला कि पिता जी ने माँ को सब कुछ बता दिया था —
कैसे डॉक्टर ने देखा, क्या कहा, और आगे क्या जांचें करनी हैं।

घर अब पहले जैसा नहीं लग रहा था…
लेकिन एक उम्मीद थी —
कि शायद इलाज शुरू होते ही सब ठीक हो जाएगा।

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