Chapter Four - Day Two At Hospital

 

जब हम पहले दौरे से वापस आए,
पिता जी ने सारी बात माँ को बता दी थी।
माँ ने मुझसे भी बहुत कुछ पूछने की कोशिश की,
पर मैंने ज़्यादा कुछ नहीं बताया —
बस इतना कहा कि “पाँच दिन बाद फिर से लखनऊ जाना है।”

धीरे-धीरे दिन बीत गए।
हर दिन के साथ बेचैनी थोड़ी और बढ़ती जा रही थी।
पाँचवां दिन आया, और हम फिर उसी हॉस्पिटल के लिए निकल पड़े।

इस बार वही डॉक्टर मिले,
बस उनका कमरा बदल गया था।
उन्होंने कुछ रिपोर्टें देखीं और बोले,
“अब कुछ और जांचें करनी होंगी — खून की जांच और एक सीटी स्कैन।”

खून की जांच के लिए सैंपल जल्दी ही दे दिया गया,
पर असली मुश्किल सीटी स्कैन की थी।
हमें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि वहाँ कितनी लंबी लाइन होती है।

मैंने पैसे जमा किए और नंबर पूछने गया —
तो पता चला कि हमारे आगे बहुत से लोग हैं…
इतने कि अगर हम उसी समय लाइन में लगें,
तो नंबर अगले दिन शाम को आएगा।

मैंने पिता जी की तरफ देखा —
वो चुपचाप पास की बेंच पर बैठे थे।
उनके चेहरे पर थकान और निराशा दोनों थी।
उन्होंने कुछ लोगों से बात करने की कोशिश की,
पर कोई उपाय नहीं निकल पा रहा था।

फिर वो उठे और अंदर सीएमओ (Chief Medical Officer) के पास चले गए।
मुझे नहीं पता उन्होंने वहाँ क्या कहा,
पर शायद उनकी बातों में एक सच्ची विनती थी —
क्योंकि करीब आधे घंटे बाद हमें अंदर बुला लिया गया।

सीटी स्कैन के कमरे में पिता जी को इंजेक्शन लगना था।
उन्होंने मुझे पास बुलाया —
मैंने उनका हाथ थाम लिया,
और डॉक्टर ने इंजेक्शन लगाया।
उनकी आँखों में हल्का सा दर्द झलक रहा था,
पर वो फिर भी मुस्कुरा दिए — जैसे कह रहे हों, “मैं ठीक हूँ।”

मैं साइड में खड़ा था,
मन में डर और उम्मीद दोनों एक साथ चल रहे थे।
पाँच मिनट बाद स्कैन पूरा हुआ।
उन्होंने रिपोर्ट की पर्ची दी और कहा —
“एक हफ़्ते बाद आना, तब तक रिपोर्ट तैयार हो जाएगी।”

डॉक्टर ने यह भी बताया कि
पिछली बार जो टांके लगाए गए थे,
वो अब निकाल दिए गए हैं — सब ठीक से भर रहा है।

हम दोनों बाहर आए।
थकावट इतनी थी कि जैसे शरीर में जान ही नहीं बची हो।
थोड़ी देर बैठकर हमने बस पकड़ी और तीन घंटे के सफ़र के बाद
वापस घर पहुँच गए।

घर पहुँचे तो माँ ने दरवाज़ा खोला।
चेहरे पर वही चिंता, वही उम्मीद।
हमने बस इतना कहा —
“रिपोर्ट अगले हफ़्ते मिलेगी…”

फिर सब अपनी-अपनी दिनचर्या में लौट आए —
पर मन कहीं और अटका था…
उस रिपोर्ट के इंतज़ार में,
जिससे आने वाले दिनों की दिशा तय होनी थी।

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